मुसाफ़िर
हर इन्सान की शख़्सियत की पहचान,ज़िन्दगी जीने के उसके रवैये से होती है।कई बार मात खाने पर भी जीत का जज़्बा होना ही ज़िन्दादिली है और मेरी यह poem ‘मुसाफ़िर’ यही message देती है। ‘ मुसाफ़िर ’ वक़्त की इन उलझनों में,थम गई है शख्सियत। उबार लूँ जो खुद को मैं, यही सफर है शब-तलक।। अक्स मेरा है लिए ,मेरी पूरी ज़िंदगी। हाथ कुछ लगा नहीं ,करके अधूरी बंदगी।। राज़ है ये एक खुला, कि हमको खुद से क्या मिला। ख्वाबों की बिखरी टुकड़ियां, आसरों का सिलसिला। क्या दौड़ थी वो बेलगाम, साया ही निकला हर मुकाम। उम्र बीत सी गई, इस तीरगी के दरम्यान।। संवार लेना है कठिन,खुद पे है यकीं मगर। ग़मों की शाम ढलने दे,आसान होगा कल सफर। ना हासिलों पर फक्र हो ,न फासलों पे हो शिकन। ज़ार (सोना)वो बना कहां, जिसने न सही तपन।। ...



